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व्रज – माघ शुक्ल अष्टमी(प्रथम)

व्रज – माघ शुक्ल अष्टमी(प्रथम)

Tuesday, 08 February 2022


छप्पनभोग मनोरथ (बड़ा मनोरथ)


आज श्रीजी में श्रीजी में किन्हीं वैष्णव द्वारा आयोजित छप्पनभोग का मनोरथ होगा.

नियम (घर) का छप्पनभोग वर्ष में केवल एक बार मार्गशीर्ष शुक्ल पूर्णिमा को ही होता है. इसके अतिरिक्त विभिन्न खाली दिनों में वैष्णवों के अनुरोध पर श्री तिलकायत की आज्ञानुसार मनोरथी द्वारा छप्पनभोग मनोरथ आयोजित होते हैं.

इस प्रकार के मनोरथ सभी वैष्णव मंदिरों एवं हवेलियों में होते हैं जिन्हें सामान्यतया ‘बड़ा मनोरथ’ कहा जाता है.

बड़ा मनोरथ के भाव से श्रीजी मंदिर के सभी मुख्य द्वारों की देहरी को पूजन कर हल्दी से लीपी जाती हैं एवं आशापाल की वंदनमाल बाँधी जाती हैं.


आज दो समय की आरती थाली की आती हैं.


मणिकोठा, डोल-तिबारी, रतनचौक आदि में छप्पनभोग के भोग साजे जाते हैं अतः श्रीजी में मंगला के पश्चात सीधे राजभोग अथवा छप्पनभोग (भोग सरे पश्चात) के दर्शन ही खुलते हैं.

श्रीजी को गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में विशेष रूप से दूधघर में सिद्ध की गयी केसर युक्त बासोंदी की हांडी व शाकघर में सिद्ध चार विविध प्रकार के फलों के मीठा अरोगाये जाते हैं.

राजभोग की अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता एवं सखड़ी में मीठी सेव, केसरयुक्त पेठा व पाँच-भात (मेवा-भात, दही-भात, राई-भात, श्रीखंड-भात, वड़ी-भात) अरोगाये जाते हैं.


छप्पनभोग दर्शन में प्रभु सम्मुख 25 बीड़ा सिकोरी (सोने का जालीदार पात्र) में रखे जाते है.

राजभोग में गोकर्ण को सब से खिलाया जाता हैं.


राजभोग दर्शन –


कीर्तन – (राग : सारंग)


मदन गोपाल गोवर्धन पूजत l

बाजत ताल मृदंग शंखध्वनि मधुर मधुर मुरली कल कूजत ll 1 ll

कुंकुम तिलक लिलाट दिये नव वसन साज आई गोपीजन l

आसपास सुन्दरी कनक तन मध्य गोपाल बने मरकत मन ll 2 ll

आनंद मगन ग्वाल सब डोलत ही ही घुमरि धौरी बुलावत l

राते पीरे बने टिपारे मोहन अपनी धेनु खिलावत ll 3 ll

छिरकत हरद दूध दधि अक्षत देत असीस सकल लागत पग l

‘कुंभनदास’ प्रभु गोवर्धनधर गोकुल करो पिय राज अखिल युग ll 4 ll


साज – आज श्रीजी में आज सफ़ेद रंग की सादी पिछवाई धरायी जाती है जिसके ऊपर गुलाल, चन्दन से खेल किया गया है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है.


वस्त्र – श्रीजी को आज केसरी लट्ठा का रुपहली ज़री की तुईलैस से सुसज्जित सूथन, चोली एवं चाकदार वागा धराया जाता है. ठाड़े वस्त्र मेघश्याम रंग के धराये जाते हैं.


श्रृंगार - श्रीजी को आज फाल्गुन का वनमाला का हल्का श्रृंगार धराया जाता है. मीना के सर्व आभरण धराये जाते हैं.

श्रीमस्तक पर केसरी टिपारा के ऊपर लाल गौकर्ण, सुनहरी घेरा एवं बायीं ओर शीशफूल धराया जाता है.

श्रीकर्ण में मीना के मकराकृति कुंडल धराये जाते हैं.

चोटीजी मीना की बायीं ओर धरायी जाती है.

कमल माला धरायी जाती हैं. श्वेत एवं गुलाबी पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं.

लहरियाँ के वेणुजी और दो वेत्रजी(एक सोना का) धराये जाते हैं. पट चीड़ का व गोटी फाल्गुन की आती है. कंदराजी पर फूल का चौखटा आता हैं.


संध्या-आरती दर्शन उपरांत प्रभु के श्रीकंठ के आभरण बड़े कर दिए जाते हैं और छेड़ान के श्रृंगार धराये जाते हैं.

टिपारा बड़ा नहीं किया जाता व लूम-तुर्रा नहीं धराये जाते हैं.


 
 
 

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