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व्रज - आश्विन शुक्ल त्रयोदशी

व्रज - आश्विन शुक्ल त्रयोदशी


गुरूवार, 29.10.2020


दीपावली के पूर्व कार्तिक कृष्ण एकादशी का आगम का श्रृंगार


विशेष - सभी बड़े उत्सवों के पहले उस श्रृंगार का आगम का श्रृंगार धराया जाता है.


आगम का अर्थ उत्सव के आगमन के आभास से है कि प्रभु के उत्सव की अनुभूति मन में जागृत हो जाए.

उत्सव आने वाला है और हम उसकी तैयारी आरंभ कर दें.


इसी श्रृंखला में आज दीपावली के पहले वाली एकादशी को धराये जाने वाले वस्त्र और श्रृंगार धराया जाता है जिसमें श्याम आधारवस्त्र पर जरदोजी के भरतकाम से सुसज्जित साज, पाग एवं श्याम जरी के चाकदार वागा धराये जाते हैं और कर्णफूल का हल्का श्रृंगार धराया जाता है.


श्रीमस्तक पर श्याम चीरा (जरी की पाग) के ऊपर डांख का नागफणी (जमाव) का कतरा धराया जाता है.


लगभग यही वस्त्र व श्रृंगार दीपावली के पूर्व की एकादशी को भी धराये जायेंगे.


इस श्रृंगार को धराये जाने का अलौकिक भाव भी जान लें.

अन्नकूट के पूर्व अष्टसखियों के भाव से आठ विशिष्ट श्रृंगार धराये जाते हैं. जिस सखी का श्रृंगार हो उनकी अंतरंग सखी की ओर से ये श्रृंगार धराया जाता है. आज का श्रृंगार चंपकलताजी का है.


संध्या-आरती दर्शन के उपरांत प्रभु के श्रीकंठ के आभरण बड़े कर छेड़ान के आभरण व श्रीमस्तक पर रुपहली लूम तुर्रा धराकर शयन दर्शन खुलते हैं.


राजभोग दर्शन -


कीर्तन - (राग: सारंग)


गोवर्धन पूजाको आये सकल ग्वाल ले संग ।

बाजत ताल मृदंग शंखध्वनि बीना पटह उपंग ।।1।।

नवसत साज चली व्रज तरुणी अपने अपने रंग ।

गावत गीत मनोहर बानी उपजत तान तरंग ।।2।।

अति पवित्र गंगाजल ले के डारत आनंद कंद ।

ता पाछे ले दूध धोरी को ढारत गोकुल चंद ।।3।।

रोरी चंदन चर्चन करके तुलसी पोहोप माल पहरावत ।

धुपदीप विचित्र भांतिनसो पीत वसन ऊपर ले उढावत ।।4।।

भाजन भर भर के कुनवारो ले ले गिरी को भोग धरावत ।

गाय खिलाय गोपाल तिलक दे पीठ थापे शिरपेच बंधावत ।।5।।

यह विधि पूजा करके मोहन सब व्रजको आनंद बढ़ावत ।

जय जय शब्द होत चहुदिशते ‘गोविन्द’ विमल यश गावत ।।6।।


साज - श्रीजी में आज गेरू (कत्थई) रंग के आधारवस्त्र के ऊपर पुष्पों की सजावट का सुनहरी सितारों के जरदोजी के काम वाली पिछवाई धरायी जाती है.


पिछवाई पर श्याम रंग के कपड़े का हांशिया है जिस पर पुष्पों का जरदोजी का काम किया हुआ है. गादी, तकिया और चरणचैकी पर सफेद रंग की बिछावट की जाती है.


वस्त्र - श्रीजी को आज श्याम रंग के एवं श्वेत जरी की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित सूथन, चोली एवं चाकदार वागा धराया जाता है. ठाड़े वस्त्र पीले दरियाई के धराये जाते हैं.


श्रृंगार - श्रीजी को आज छेड़ान (कमर तक) का हल्का श्रृंगार धराया जाता है. हीरे, मोती एवं सोने के सर्व आभरण धराये जाते हैं.


श्रीमस्तक पर श्याम रंग के चीरा (जरी की पाग) के ऊपर सिरपैंच, लूम तथा डाँख का जमाव (नागफणी) का कतरा रूपहली तुर्री एवं बायीं ओर शीशफूल धराया जाता है. श्रीकर्ण में हीरा के कर्णफूल के दो जोड़ी धराये जाते हैं. त्रवल नहीं धराया जाता वहीं हीरा की बग्घी धरायी जाती है.


आज जुगावाली चार एवं सात माला धराई जाती हैं. गुलाबी एवं श्वेत पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती है.


श्रीहस्त में कमलछड़ी,विट्ठलेशजी वाले वेणुजी एवं एक वेत्रजी (एक स्वर्ण का) धराये जाते हैं. पट प्रतिनिधि का व गोटी श्याम मीना की आती है.


 
 
 

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