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व्रज – मार्गशीर्ष कृष्ण चतुर्दशी

व्रज – मार्गशीर्ष कृष्ण चतुर्दशी

Sunday, 13 December 2020


श्री गुसांईजी के सप्तम लालजी श्री घनश्यामजी का प्राकट्योत्सव


विशेष – आज श्री गुसांईजी के सप्तम लालजी श्री घनश्यामजी का प्राकट्योत्सव है. श्री गुसांईजी ने आपको श्री मदनमोहनजी का स्वरुप सेवा हेतु प्रदान किया था.


एक बार ग्रीष्मकाल में छत पर आप प्रभु को पोढ़ाकर नैत्र बंदकर पंखा झल रहे थे, तभी कोई प्रभु व स्वामिनीजी के स्वरुप चुराकर ले गया. प्रभु के वियोगमें श्री घनश्यामजीने वियोग का अनुभव किया और विरह पदो का गान करके समय व्यतीत करके लीलामे प्रवेश किया.यह विरह पद 'घनश्याम' छाप से प्रसिद्द है।

आपश्री द्वारा वल्लभाचार्यजी कृत 'मधुराष्टकम्' एवं श्री प्रभुचरण कृत 'गुप्तरस' ग्रंथ पर संस्कृत टीका लिखी गई हैं.

आपके यहाँ विराजित यह स्वरुप श्री यज्ञनारायण भट्टजी को यज्ञवेदी में प्राप्त हुआ था.

श्री हरिरायजी के वर्णन के अनुसार प्रभु श्री मदनमोहनजी एवं दोनों स्वामिनीजी के स्वरुप कुछ समय पश्चात नाथद्वारा में शाकघर में सेवक एक बाई के पास से पुनः प्राप्त हुए.

इस कारण से आज श्री घनश्यामजी की ओर से श्रीजी को कुल्हे जोड़ का श्रृंगार धराया जाता है.

श्री घनश्यामजी षडऐश्वर्य में वैराग्य के स्वरुप थे अतः प्रभु को मयूरपंख की जोड़, प्रभु में आपका अनुराग था अतः अनुराग के भाव के लाल वस्त्र एवं उभय स्वामिनी जी के भाव से पीले ठाड़े वस्त्र धराये जाते हैं.


आज गोपमास के भाव से श्री नवनीतप्रियाजी और कई अन्य कई पुष्टिमार्गीय वैष्णव मंदिरों में विशेष रूप से उड़द दाल की कचौरी अरोगायी जाती है.


सेवाक्रम - उत्सव होने के कारण श्रीजी मंदिर के सभी मुख्य द्वारों की देहरी (देहलीज) को हल्दी से लीपी जाती हैं एवं आशापाल की सूत की डोरी की वंदनमाल बाँधी जाती हैं.


आज श्रीजी को नियम के लाल साटन के चाकदार वागा धराये जाते हैं. श्रीमस्तक पर पन्ना की जडाऊ कुल्हे के ऊपर पांच मोरपंख की चन्द्रिका धरायी जाती है.


गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में श्रीजी को दूधघर में सिद्ध की गयी केसर युक्त बासोंदी की हांडी अरोगायी जाती है.

इसके अतिरिक्त आज गोपीवल्लभ भोग में ही श्री नवनीतप्रियाजी में से उड़द दाल की कचौरी व छुकमां दही श्रीजी के भोग हेतु आते हैं.


राजभोग में अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता अरोगाया जाता है.


श्री गुसांईजी के सभी पुत्रों के उत्सव सातों गृहों में मनाये जाते हैं अतः आज द्वितीय पीठाधीश्वर प्रभु श्री विट्ठलनाथजी एवं तृतीय गृहाधीश्वर प्रभु श्री द्वारिकाधीशजी (कांकरोली) के घर से भी श्रीजी के भोग हेतु सामग्री आती है.


राजभोग दर्शन –


कीर्तन – (राग : सारंग)


जयति रुक्मणी नाथ पद्मावती प्राणपति व्रिप्रकुल छत्र आनंदकारी l

दीप वल्लभ वंश जगत निस्तम करन, कोटि ऊडुराज सम तापहारी ll 1 ll

जयति भक्तजन पति पतित पावन करन कामीजन कामना पूरनचारी l

मुक्तिकांक्षीय जन भक्तिदायक प्रभु सकल सामर्थ्य गुन गनन भारी ll 2 ll

जयति सकल तीरथ फलित नाम स्मरण मात्र वास व्रज नित्य गोकुल बिहारी l

‘नंददास’नी नाथ पिता गिरिधर आदि प्रकट अवतार गिरिराजधारी ll 3 ll


साज – आज श्रीजी में लाल साटन की सुनहरी ज़री की किनारी के हांशिया वाली पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफेद बिछावट की जाती है.


वस्त्र – श्रीजी को आज लाल साटन के सुनहरी ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित सूथन, चोली, चाकदार वागा एवं इसी प्रकार के टंकमां हीरा के काम वाले मोजाजी धराये जाते हैं. ठाड़े वस्त्र पीले रंग के धराये जाते हैं.


श्रृंगार – श्रीजी को वनमाला का (चरणारविन्द तक) भारी श्रृंगार धराया जाता है. पन्ना के सर्व आभरण धराये जाते हैं.

श्रीमस्तक पर पन्ना की जड़ाऊ कुल्हे के ऊपर सिरपैंच, पांच मोरपंख की चन्द्रिका की जोड़ एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में मकराकृति कुंडल धराये जाते हैं.

बायीं ओर मीना की चोटी धरायी जाती है.

कली, कस्तूरी आदि सभी माला धरायी जाती है.

श्वेत एवं पीले पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती है. श्रीहस्त में पन्ना के वेणुजी एवं दो वेत्रजी (सोने व पन्ना के) धराये जाते हैं.

पट लाल एवं गोटी स्याम मीना की आती हैं.

आरसी शृंगार में पिले खंड की एवं राजभोग में सोना की डांडी की आती हैं.


संध्या-आरती दर्शन के उपरांत श्रीकंठ व श्रीमस्तक के श्रृंगार बड़े कर छेड़ान के (छोटे) श्रृंगार धराये जाते हैं. श्रीमस्तक पर लाल कुल्हे धरायी जाती है परन्तु लूम तुर्रा नहीं धराये जाते हैं.


 
 
 

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