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व्रज - चैत्र कृष्ण सप्तमी

व्रज - चैत्र कृष्ण सप्तमी

Tuesday, 10 March 2026


समस्त वैष्णव सृष्टि को प्रधान गृह युवराज श्री विशाल बावाश्री के गो. चि. श्री लाल गोविन्दजी (लालबावा साहब) के जन्मदिन की ख़ूबख़ूब बधाई


श्री वल्लभ कल्पद्रुम फल्यो, फल लाग्यो विट्ठलेश ।

शाखा सब बालक भये, ताको पार ना पावत शेष ।।

श्री वल्लभ को कल्पद्रुम, छाय रह्यो जग मांहि।

पुरुषोत्तम फल देत हैं, नेक जो बैठों छांह ॥


गो. चि. श्री लाल गोविन्दजी (लालबावा साहब) का जन्मदिन


सेवाक्रम - श्रीजी मंदिर के सभी मुख्य द्वारों की देहरी (देहलीज) को पूजन कर हल्दी से लीपी जाती हैं एवं आशापाल की सूत की डोरी की वंदनमाल बाँधी जाती हैं.


आज प्रभु को नियम के लाल सलीदार चाकदार वागा धराये जाते हैं. श्रीमस्तक पर लाल रंग के दुमाला के ऊपर हीरा का सिरपैंच, सुनहरी भीमसेनी कतरा धराया जाता हैं.


आज प्रभु को चेती गुलाब की छड़ी गेंद बसंत वत विशेष धरायी जाती हैं.

श्रीहस्त में चेती गुलाब की छड़ी धरायी जाती हैं.


आज राजभोग में चैत्री-गुलाब की छज्जे वाली बड़ी फूल मंडली आती हैं.


पूरे दिन प्रभु के सम्मुख खिड़क (काष्ट की गौमाता का समूह) बिरजायी जाती है.


सभी समां में 'गोविन्द' शब्द प्रयुक्त होवे ऐसे सुन्दर कीर्तन गाये जाते हैं.


श्रीजी को गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में विशेष रूप से मनमनोहर (केशर बूंदी) के लड्डू, दूधघर में सिद्ध की गयी केसरयुक्त बासोंदी की हांडी और चार विविध प्रकार के फलों के मीठा अरोगाये जाते हैं.


राजभोग में अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता एवं सखड़ी में बड़े टुक पाटिया व छह-भात (मेवा-भात, दही-भात, राई-भात, श्रीखंड-भात, वड़ी-भात व नारंगी भात) अरोगाये जाते हैं.

भोग में फीका की जगह चालनी अरोगायी जाती हैं.


राजभोग दर्शन -


कीर्तन (राग : सारंग)


वृन्दावन सघनकुंज माधुरी लतान तर, जमुना पुलिनमे मधुर बाजे बांसुरी l

जबते धुनि सुनि कान मानो लागे मदनबान, प्रानहुकी कहा कहू पीर होत पांसुरी ll 1 ll

लाल काछनी कटि किंकिणी पग नूपुर झंझनन, सिर टिपारो अति खरोई सुरंग ll 2 ll

उरप तिरप मंद चाल मुरलिका मृदंग ताल, संग मुदित गोपग्वाल आवत तान तरंग l

व्रजजन सब हरखनिरख जै जै कहि कुसुम बरखि, 'गोविंदप्रभु' पर वारौ कोटि अनंग ll 3 ll


साज – आज श्रीजी में गौचारण के भाव की सुन्दर चित्रांकन से सुशोभित पिछवाई धरायी जाएगी.

गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफेद बिछावट की जाती है.


वस्त्र – आज श्रीजी को लाल सलीदार ज़री के सुनहरी एवं रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित सूथन, चोली के चाकदार वागा धराये जाते हैं. ठाड़े वस्त्र मेघस्याम रंग के धराये जाते हैं.


श्रृंगार - आज प्रभु को मध्य का (घुटनों तक) उत्सववत भारी श्रृंगार धराया जाता है. हीरा व पन्ना के सर्व आभरण धराये जाते हैं.

श्रीमस्तक पर लाल रंग के दुमाला के ऊपर हीरा का सिरपैंच, सुनहरी भीमसेनी कतरा एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में हीरा के मकराकृति कुंडल धराये जाते हैं.

आज चोटीजी नहीं धराई जाती हैं.

कंठला एवं उत्सव की पन्ना की मालाये धरायी जाती है.

हास की जगह पन्ना को कंठा एवं हीरा का त्रवल धराया जाता हैं.

एक कली का हार एवं कमल माला धरायी जाती हैं.

श्वेत एवं गुलाबी पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं.

हीरा की मुठ के वेणुजी एवं वेत्रजी धराये जाते हैं.

पट लाल का एवं गोटी सोना की बाघ बकरी की आती हैं.

आरसी बावा साहब वाली काँच के टुकड़ों की आती है.



संध्या-आरती दर्शन के उपरांत श्रीकंठ के आभरण बड़े कर छेड़ान के (छोटे) आभरण धराये जाते हैं. शयन दर्शन में श्रीमस्तक पर दुमाला रहे लूम-तुर्रा नहीं आवे.

 
 
 

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