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व्रज – पौष शुक्ल पूर्णिमा

व्रज – पौष शुक्ल पूर्णिमा

Saturday, 03 January 2026


अरी में रतन जतन करि पायो ।

ऊधरे भाग आज सखी मेरे रसिक सिरोमनि आयो ।।१।।

आवतही उठ के दे आदर आगे ढिंग बैठायो ।

मुख चुंबन दे अधर पान कर भेट सकल अंग लायो ।।२।।

अद्भुत रूप अनूप श्यामको निरखत नैन सिरायो ।

निसदिन यही अपने ठाकुर को रसिक गुढ जश गायो ।।३।।


श्वेत साटन के चागदार वागा गुलाबी गाती का पटका एवं श्रीमस्तक पर जड़ाऊ कूल्हे और मुकुट का पान के शृंगार


विशेष – वर्षभर में बारह पूर्णिमा होती है जिनमें से आज के अतिरिक्त सभी ग्यारह पूर्णिमाओं को नियम के श्रृंगार धराये जाते हैं अर्थात केवल आज की ही पूर्णिमा का श्रृंगार ऐच्छिक है.


छप्पनभोग मनोरथ (बड़ा मनोरथ)


आज श्रीजी में श्रीजी में किन्हीं वैष्णव द्वारा आयोजित छप्पनभोग का मनोरथ होगा.

नियम (घर) का छप्पनभोग वर्ष में केवल एक बार मार्गशीर्ष शुक्ल पूर्णिमा को ही होता है. इसके अतिरिक्त विभिन्न खाली दिनों में वैष्णवों के अनुरोध पर श्री तिलकायत की आज्ञानुसार मनोरथी द्वारा छप्पनभोग मनोरथ आयोजित होते हैं.

इस प्रकार के मनोरथ सभी वैष्णव मंदिरों एवं हवेलियों में होते हैं जिन्हें सामान्यतया ‘बड़ा मनोरथ’ कहा जाता है.

बड़ा मनोरथ के भाव से श्रीजी मंदिर के सभी मुख्य द्वारों की देहरी को पूजन कर हल्दी से लीपी जाती हैं एवं आशापाल की वंदनमाल बाँधी जाती हैं.


आज दो समय की आरती थाली की आती हैं.


मणिकोठा, डोल-तिबारी, रतनचौक आदि में छप्पनभोग के भोग साजे जाते हैं अतः श्रीजी में मंगला के पश्चात सीधे राजभोग अथवा छप्पनभोग (भोग सरे पश्चात) के दर्शन ही खुलते हैं.

श्रीजी को गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में विशेष रूप से दूधघर में सिद्ध की गयी केसर युक्त बासोंदी की हांडी व शाकघर में सिद्ध चार विविध प्रकार के फलों के मीठा अरोगाये जाते हैं.

राजभोग की अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता एवं सखड़ी में मीठी सेव, केसरयुक्त पेठा व पाँच-भात (मेवा-भात, दही-भात, राई-भात, श्रीखंड-भात, वड़ी-भात) अरोगाये जाते हैं.


छप्पनभोग दर्शन में प्रभु सम्मुख 25 बीड़ा सिकोरी (सोने का जालीदार पात्र) में रखे जाते है.


राजभोग दर्शन –


कीर्तन – (राग : सारंग)


मदन गोपाल गोवर्धन पूजत l

बाजत ताल मृदंग शंखध्वनि मधुर मधुर मुरली कल कूजत ll 1 ll

कुंकुम तिलक लिलाट दिये नव वसन साज आई गोपीजन l

आसपास सुन्दरी कनक तन मध्य गोपाल बने मरकत मन ll 2 ll

आनंद मगन ग्वाल सब डोलत ही ही घुमरि धौरी बुलावत l

राते पीरे बने टिपारे मोहन अपनी धेनु खिलावत ll 3 ll

छिरकत हरद दूध दधि अक्षत देत असीस सकल लागत पग l

‘कुंभनदास’ प्रभु गोवर्धनधर गोकुल करो पिय राज अखिल युग ll 4 ll


साज – श्रीजी में आज लाल रंग की सुरमा सितारा के कशीदे के ज़रदोज़ी के काम वाली एवं हांशिया वाली शीतकाल की पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफेद बिछावट की जाती है.


वस्त्र – आज श्रीजी को सफ़ेद साटन के का रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित सूथन, चोली, चाकदार वागा एवं सफ़ेद रंग के मोजाजी धराये जाते हैं. पतंगी रंग का गाती का रुमाल (पटका) धराया जाता है. ठाड़े वस्त्र मेघश्याम रंग के धराये जाते हैं.


श्रृंगार – आज प्रभु को वनमाला का (चरणारविन्द तक) भारी श्रृंगार धराया जाता है. माणक के सर्व आभरण धराये जाते हैं.

श्रीमस्तक पर जड़ाऊ कुल्हे के ऊपर सिरपैंच, जड़ाव का छोटा पान के ऊपर किरीट का बड़ा जड़ाव पान (खोंप) एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में मयूराकृति कुंडल धराये जाते हैं. कली, कस्तूरी एवं कमल माला धरायी जाती हैं. पीले एवं श्वेत पुष्पों की दो सुन्दर थागवाली मालाजी धरायी जाती हैं. श्रीहस्त में भाभीजी वाले वेणुजी एवं दो वेत्रजी धराये जाते हैं.


पट श्वेत एवं गोटी मीना की आती हैं.

 
 
 

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