top of page
Search

व्रज - श्रावण शुक्ल त्रयोदशी

व्रज - श्रावण शुक्ल त्रयोदशी

Thursday, 07 August 2025


किंकोडा तेरस, चतुरा नागा के श्रृंगार


आज किंकोड़ा तेरस है. आज के दिन व्रज में विराजित श्रीजी यवनों के उपद्रव का नाश कर पाड़े (भैंसे) के ऊपर बैठकर रामदासजी, कुम्भनदासजी आदि को साथ लेकर चतुरा नागा नाम के विरक्त योगी को दर्शन देने एवं उक्त पाड़े (भैंसे) का उद्धार करने टॉड का घना नाम के घने वन में पधारे थे.


चतुरा नागा श्रीजी के दर्शन को लालायित थे परन्तु वे श्री गिरिराजजी पर पैर नहीं रखते थे जिससे श्रीजी के दर्शन से विरक्त थे.

भक्तवत्सल प्रभु अत्यन्त दयालु हैं एवं अपने सभी भक्तों को मान देते हैं अतः वे स्वयं अपने भक्त को दर्शन देने पधारे. चतुरा नागा की अपार प्रसन्नता का कोई छोर नहीं था.

वर्षा ऋतु थी सो चतुरा नागा तुरंत वन से किंकोडा के फल तोड़ लाये और उसका शाक सिद्ध किया. रामदासजी साथ में सीरा (गेहूं के आटे का हलवा) सिद्ध कर के लाये थे सो श्रीजी को सीरा एवं किंकोडा का शाक भोग अरोगाया.


तब कुम्भनदासजी ने यह पद गाया –

“भावत है तोहि टॉडको घनो ।

कांटा लगे गोखरू टूटे फाट्यो है सब तन्यो ।।१।।

सिंह कहां लोकड़ा को डर यह कहा बानक बन्यो ।

‘कुम्भनदास’ तुम गोवर्धनधर वह कौन रांड ढेडनीको जन्यो ।।२।।


कुछ देर पश्चात समाचार आये कि यवन लश्कर फिर से बढ़ गया है जिससे तुरंत श्रीजी को पुनः मंदिर में पधराया गया.


आज भी राजस्थान में भरतपुर के समीप टॉड का घना नमक स्थान पर श्रीजी की चरणचौकी एवं बैठकजी है जो कि अत्यंत रमणीय स्थान है.


आज श्रीजी को मुकुट-काछनी का श्रृंगार धराया जाता है.


उपरोक्त प्रसंग की भावना से ही आज के दिन श्रीजी को गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में किंकोडा का शाक एवं सीरा (गेहूं के आटे का हलवा) अरोगाया जाता है.


अद्भुत बात यह है कि आज भी प्रभु को उसी लकड़ी की चौकी पर यह भोग रखे जाते हैं जिस पर सैंकड़ों वर्ष पूर्व चतुरा नागा ने प्रभु को अपनी भाव भावित सामग्री अरोगायी थी.


राजभोग दर्शन –


कीर्तन – (राग : सारंग)


आज महा मंगल महराने l

पंच शब्द ध्वनि भीर बधाई घर घर बेरखबाने ll 1 ll

ग्वाल भरे कांवरि गोरस की वधु सिंगारत वाने l

गोपी ग्वाल परस्पर छिरकत दधि के माट ढुराने ll 2 ll

नाम करन जब कियो गर्गमुनि नंद देत बहु दाने l

पावन जश गावति ‘कटहरिया’ जाही परमेश्वर माने ll 3 ll


साज – चतुरा नागा के भाव चित्रांकन की सुन्दर पिछवाई आज श्रीजी में धरायी जाती है. (चित्र में भिन्न)

गादी और तकिया के ऊपर सफेद बिछावट की जाती है तथा स्वर्ण की रत्नजड़ित चरणचौकी के ऊपर हरी मखमल मढ़ी हुई होती है. पीठिका के ऊपर व इसी प्रकार से पिछवाई के ऊपर रेशम के रंग-बिरंगे पवित्रा धराये जाते हैं.


वस्त्र – श्रीजी को आज चौफूली चूंदड़ी की सुनहरी ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित सूथन, काछनी एवं पटका धराया जाता है. ठाड़े वस्त्र सफेद डोरीया के धराये जाते है.


श्रृंगार - प्रभु को आज वनमाला (चरणारविन्द तक) का भारी श्रृंगार धराया जाता है. आभरण हीरा मोती के धराये जाते हैं. श्रीमस्तक पर सलमा सितारा का मुकुट व टोपी एवं बायीं ओर शीशफूल धराया जाता है.

श्रीकर्ण में मोती के कुंडल धराये जाते हैं. चोटीजी नहीं आती हैं.श्रीकंठ में कली,कस्तूरी आदि की माला आती हैं.पीले पुष्पों के रंग-बिरंगी थाग वाली दो सुन्दर मालाजी एवं कमल के फूल की मालाजी धरायी जाती है. श्रंग-बिरंगे पवित्रा मालाजी के रूप में धराये जाते हैं.

श्रीहस्त में कमलछड़ी, लहरिया के वेणुजी एवं वेत्रजी ( एक सोना का) धराये जाते हैं.


ree

पट लाल एवं गोटी मीना की धराई जाती हैं.

 
 
 

Comments


© 2020 by Pushti Saaj Shringar.

bottom of page