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व्रज - कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा

व्रज - कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा

Saturday, 02 November 2024


मेघश्याम सलीदार ज़री के घेरदार वागा, श्रीमस्तक पर चीरा (गोल पाग) पर गोल चंद्रिका के शृंगार


राजभोग दर्शन –


कीर्तन – (राग : सारंग)


ब्रजजन लोचन ही को तारो ।

सुन यशोमति तेरो पूत सपुतो कुल दीपक उजियारो ।।१।।

धेनु चरावत जात दूर तब होत भवन अति भारो ।

घोष सजीवन मुर हमारो छिन इत ऊत जिन टारो ।।२।।

सात द्योस गिरिराज धर्यो कर सात बरसको बारो ।

गोविंद प्रभु चिरजियो रानी तेरो सुत गोप वंश रखवारो ।।३।।


साज – आज श्रीजी में मेघश्याम ज़री की पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी के ऊपर सफ़ेद बिछावट की जाती है.


वस्त्र – आज श्रीजी को मेघश्याम सलीदार ज़री का सूथन, चोली एवं घेरदार वागा धराये जाते हैं. पीले रंग के ठाडे वस्त्र धराये जाते हैं.


श्रृंगार – आज प्रभु को मध्य का (घुटने तक) हल्का श्रृंगार धराया जाता है. माणक के सर्व आभरण धराये जाते हैं.

श्रीमस्तक पर मेघश्याम ज़री के चीरा (गोल पाग)के ऊपर सिरपैंच, गोल चंद्रिका एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में एक जोड़ी हीरा के कर्णफूल धराये जाते हैं.

गुलाबी पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं.

श्रीहस्त में पुष्पछड़ी, लाल मीना के वेणुजी एवं एक वेत्रजी धराये जाते हैं.

पट मेघश्याम एवं गोटी चाँदी की आती है.



संध्या-आरती दर्शन के उपरांत श्रीकंठ के आभरण बड़े कर छेड़ान के (छोटे) आभरण धराये जाते हैं. शयन दर्शन में श्रीमस्तक पर लूम-तुर्रा रूपहरी धराया जाता है.

 
 
 

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